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ਕੇਜਰੀਵਾਲਾ! ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਉੱਲੂ ਬਣਾਉਣਾ ਬੰਦ ਕਰ: ਸਰੋਜ ਸਿੰਘ

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आज आम आदमी एक बार फिर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. जिस मासूमियत से आप दादरी कांड पर राजनीति नहीं करने की सलाह देकर भी, बड़ी सफाई से राजनीति कर गए, उससे बेहद छला हुआ महसूस कर रहा है. आम आदमी ने खुद को तब भी छला हुआ महसूस किया जब फर्जी डिग्री विवाद में अपने विधायक का नाम आने पर आप उसका समर्थन कर रहे थे. तब भी जब आप एक महिला को मारने-पीटने और जान से मारने तक की कोशिश करने वाले अपनी पार्टी के विधायक का पक्ष लेते हुए नजर आए थे. तब भी जब आपने लोकपाल बिल से पहले विधायकों की सैलरी बढ़ाने वाली रिपोर्ट तैयार करवा ली. लेकिन इस बार ये अहसास कुछ ज्यादा ही है.

शायद आप भूल गए हों तो आपको याद दिला दें कि 2011 में जब दिल्ली और आसपास के इलाकों में सैकड़ों, हजारों की भीड़ हाथों में तिरंगा और मोमबत्तियां लिए सड़कों पर उतर आई थी. वजह था लोकपाल बिल. वो लोकपाल बिल जिसके लिए अन्ना हजारे और आपने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी. तब लाखों लोगों ने भ्रष्टाचार की लड़ाई में आपकी आवाज के साथ अपनी आवाज मिलाई थी. उस वक्त किसी को ये एहसास तक नहीं था कि चार जोड़ी कपड़ों में देश को बदलने की ताकत रखने वाला यह शख्स एक दिन सियासत के मैदान पर ऐसा खेल दिखाएगा कि राजनीति के माहिर खिलाड़ी भी बगले झांकने लगेंगे. आप आज ऐसी राजनीति के चाणक्य बन चुके हैं जिसे दादरी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी राजनीति करने में कोई हिचक नहीं.

दादरी कांड पर तमाम पार्टियों के नेताओं की जिस राजनीति का जिक्र आप अपने रेडियो संदेश में कर रहे हैं, क्या आप खुद उसका हिस्सा नहीं हैं? दादरी कांड के बाद आप किस हैसियत से वहां गए थे? क्या दादरी दिल्ली में आता है? जब ग्रेटर नोएडा के पुलिसवालों ने आपको बिसाहड़ा गांव जाने से रोका तब आप रुके क्यों नहीं? और ये जो रेडियो संदेश आपने दिया है इसका ख्याल वहां जाने के बाद आया या फिर इस राजनीति में दूसरी पार्टियों से पिछड़ने के बाद? क्या दादरी जाने का आपका कदम राजनीति से प्रेरित नहीं था? क्या आपके दिमाग में उत्तर प्रदेश के आने वाले विधानसभा चुनाव नहीं हैं? क्या आपके साथ दादरी गए पार्टी के दो वरिष्ठ नेता संजय सिंह और कुमार विश्वास खुद को यूपी के मुख्यमंत्री पद का भावी उम्मीदवार नहीं मानते?  ऐसे में हम ये क्यों न मानें कि दादरी आप भी वही राजनीति करने गए थे जो दूसरी पार्टियां ने की.

अब सवाल आपके रेडियो संदेश का. एफएम पर आडियो संदेश देकर भी आपका मन नहीं भरा तो आपने ये संदेश अपने 56 लाख फॉलोअर्स को ट्वीट कर दिया. ताकि वो इस संदेश को पूरे देश में फैला सकें. जिस हिंदू-मुस्लमान की राजनीति बंद करने की आप बार-बार दुहाई दे रहे हैं, अपने 1 मिनट 41 सेकेंड के ऑडियो संदेश में आपने उसी शब्द का 13 बार इस्तेमाल किया है. क्या ऐसे बढ़ेगा देश का सांप्रदायिक सौहार्द? आप अपने ऑडियो संदेश में कहते हैं कि इन सब घटनाओं को सिर्फ ‘आम आदमी’ ही बचा सकता है. ऐसे में आपका इशारा आम आदमी पार्टी की तरफ क्यों न माना जाए? और अगर वाकई में आपका इशारा आम आदमी पार्टी की तरफ नहीं है तो आपने ऐसे शब्द का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जो आपकी पार्टी से मिलता जुलता नहीं होता? क्यों न आपके इन शब्दों को आपकी पार्टी का प्रचार माना जाए? पहली बार आपने आपने संदेश में बताया कि क्रिमिनल भी हिन्दू और मुसलमान होते हैं और हां आपको बता दें एक शख्स की हत्या को दंगा भी नहीं कहते. दिल्ली की ऐसी घटना पर किसी और राज्य के मुख्यमंत्री ने इन शब्दों का इस्तेमाल किया होता तो आप न जाने कौन सी धाराएं लगा कर उसके खिलाफ कोर्ट चले जाते. कुछ नहीं होता तो अखबारों में फुल पेज विज्ञापन छपवा कर उसकी फजीहत कर देते.

आपने अपने इस ऑडियो संदेश में लोगों को ये भी याद दिला दिया कि गाय के काटे जाने का बदला सुअर काटकर भी लिया जा सकता है. इतना कुछ कहने के बाद आपका मीडिया पर नेताओं के जहरीले बयान दिखाने का सवाल उठाना कितना जायज है? जरा सोचिए, क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री की ऐसी भाषा उचित है?  क्यों आप दिल्ली की जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा अपनी सरकार और पार्टी के प्रचार पर कर रहे हैं? जिस दिन आपने बजट में विज्ञापन के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा था, उस दिन दिल्ली के उप मुख्यमंत्री ने कहा था कि –मीडिया हमारा अच्छा काम दिखाना शुरू कर दे, हम अपना प्रचार करना बंद कर देंगे. अब आप ही समझाइए इस ऑडियो संदेश में आप अपनी सरकार और पार्टी के किस अच्छे काम का प्रचार कर रहे हैं?  इससे दिल्ली की जनता का कैसे और कितना फायदा हो रहा है?

अरविंद केजरीवाल जी, आपसे विनम्र निवेदन है कि अगर आपको वाकई में कुछ बंद करना है तो आप देश की जनता को उल्लू बनाना बंद कीजिए. अपने महिमामंडन के लिए जनता के पैसों का इस्तेमाल करना बंद कीजिए. बंद कीजिए दिल्ली और देश की भोली जनता की उम्मीदों और सपनों से खेलना. मत भूलिए आप भ्रष्टाचार मिटाने का वादा करकर राजनीति में आए थे और दिल्ली की जनता ने इस नेक पहल में बढ़-चढ़कर आपका साथ दिया था. प्रचंड बहुमत देकर आपको सिर-माथे पर बिठाया. लेकिन आप अपने तमाम वादे भुलाते जा रहे हैं. साथ ही साथ आपकी राजनीतिक लालसा भी बढ़ती जा रही है. आप दिल्ली के मुख्यमंत्री की गद्दी से देश के प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुंचने का सपना देख रहे हैं- अगर ऐसा है तो खुलकर इसे कबूल कीजिए. यूं सिर्फ रेडियो पर छद्म तरीके से अपनी मंशा मत जाहिर कीजिए. आपकी पार्टी ने चुनाव से पहले नारा दिया था पांच साल केजरीवाल, कम से कम उस वादे पर तो खरा उतरिए. अभी तो सिर्फ 8 महीने ही बीते हैं, दिल्ली पर ध्यान दीजिए, दादरी तक के सपने मत देखिए.

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